रविवार, 11 अप्रैल 2021

राहु अष्टोत्तरशतनामावलिः राहू की दशा के लिए आवश्यक जानकारी

 

राहु अष्टोत्तरशतनामावलिः

 

राहु बीज मन्त्र 

ॐ भ्रां भ्रीं भ्रौं सः राहवे नमः ॥

 

ॐ राहवे नमः ॥

ॐ सैंहिकेयाय नमः ॥

ॐ विधुन्तुदाय नमः ॥

ॐ सुरशत्रवे नमः ॥

ॐ तमसे नमः ॥

ॐ फणिने नमः ॥

ॐ गार्ग्यनयाय नमः ॥

ॐ सुरापिने नमः ॥

ॐ नीलजीमूतसंकाशाय नमः ॥

ॐ चतुर्भुजाय नमः ॥ १०

ॐ खङ्गखेटकधारिणे नमः ॥

ॐ वरदायकहस्तकाय नमः ॥

ॐ शूलायुधाय नमः ॥

ॐ मेघवर्णाय नमः ॥

ॐ कृष्णध्वजपताकावते नमः ॥

ॐ दक्षिणाशामुखरथाय नमः ॥

ॐ तीक्ष्णदंष्ट्रकरालकाय नमः ॥

ॐ शूर्पाकारसंस्थाय नमः ॥

ॐ गोमेदाभरणप्रियाय नमः ॥

ॐ माषप्रियाय नमः ॥ २०

ॐ कश्यपर्षिनन्दनाय नमः ॥

ॐ भुजगेश्वराय नमः ॥

ॐ उल्कापातयित्रे नमः ॥

ॐ शूलिने नमः ॥

ॐ निधिपाय नमः ॥

ॐ कृष्णसर्पराजे नमः ॥

ॐ विषज्वलावृतास्याय अर्धशरीराय नमः ॥

ॐ शात्रवप्रदाय नमः ॥

ॐ रवीन्दुभीकराय नमः ॥

ॐ छायास्वरूपिणे नमः ॥ ३०

ॐ कठिनाङ्गकाय नमः ॥

ॐ द्विषच्चक्रच्छेदकाय नमः ॥

ॐ करालास्याय नमः ॥

ॐ भयंकराय नमः ॥

ॐ क्रूरकर्मणे नमः ॥

ॐ तमोरूपाय नमः ॥

ॐ श्यामात्मने नमः ॥

ॐ नीललोहिताय नमः ॥

ॐ किरीटिणे नमः ॥

ॐ नीलवसनाय नमः ॥ ४०

ॐ शनिसमान्तवर्त्मगाय नमः ॥

ॐ चाण्डालवर्णाय नमः ॥

ॐ अश्व्यर्क्षभवाय नमः ॥

ॐ मेषभवाय नमः ॥

ॐ शनिवत्फलदाय नमः ॥

ॐ शूराय नमः ॥

ॐ अपसव्यगतये नमः ॥

ॐ उपरागकराय नमः ॥

ॐ सोमसूर्यच्छविविमर्दकाय नमः ॥

ॐ नीलपुष्पविहाराय नमः ॥ ५०

ॐ ग्रहश्रेष्ठाय नमः ॥

ॐ अष्टमग्रहाय नमः ॥

ॐ कबन्धमात्रदेहाय नमः ॥

ॐ यातुधानकुलोद्भवाय नमः ॥

ॐ गोविन्दवरपात्राय नमः ॥

ॐ देवजातिप्रविष्टकाय नमः ॥

ॐ क्रूराय नमः ॥

ॐ घोराय नमः ॥

ॐ शनेर्मित्राय नमः ॥

ॐ शुक्रमित्राय नमः ॥ ६०

ॐ अगोचराय नमः ॥

ॐ माने गङ्गास्नानदात्रे नमः ॥

ॐ स्वगृहे प्रबलाढ्यदाय नमः ॥

ॐ सद्गृहेऽन्यबलधृते नमः ॥

ॐ चतुर्थे मातृनाशकाय नमः ॥

ॐ चन्द्रयुक्ते चण्डालजन्मसूचकाय नमः ॥

ॐ सिंहजन्मने नमः ॥

ॐ राज्यदात्रे नमः ॥

ॐ महाकायाय नमः ॥

ॐ जन्मकर्त्रे नमः ॥ ७०

ॐ विधुरिपवे नमः ॥

ॐ मादकङ्य़ानदाय नमः ॥

ॐ जन्मकन्याराज्यदात्रे नमः ॥

ॐ जन्महानिदाय नमः ॥

ॐ नवमे पितृहन्त्रे नमः ॥

ॐ पञ्चमे शोकदायकाय नमः ॥

ॐ द्यूने कलत्रहन्त्रे नमः ॥

ॐ सप्तमे कलहप्रदाय नमः ॥

ॐ षष्ठे वित्तदात्रे नमः ॥

ॐ चतुर्थे वैरदायकाय नमः ॥ ८०

ॐ नवमे पापदात्रे नमः ॥

ॐ दशमे शोकदायकाय नमः ॥

ॐ आदौ यशः प्रदात्रे नमः ॥

ॐ अन्ते वैरप्रदायकाय नमः ॥

ॐ कालात्मने नमः ॥

ॐ गोचराचाराय नमः ॥

ॐ धने ककुत्प्रदाय नमः ॥

ॐ पञ्चमे धिशणाशृङ्गदाय नमः ॥

ॐ स्वर्भानवे नमः ॥

ॐ बलिने नमः ॥ ९०

ॐ महासौख्यप्रदायिने नमः ॥

ॐ चन्द्रवैरिणे नमः ॥

ॐ शाश्वताय नमः ॥

ॐ सुरशत्रवे नमः ॥

ॐ पापग्रहाय नमः ॥

ॐ शाम्भवाय नमः ॥

ॐ पूज्यकाय नमः ॥

ॐ पाटीरपूरणाय नमः ॥

ॐ पैठीनसकुलोद्भवाय  नमः ॥

ॐ भक्तरक्षाय नमः ॥ १००

ॐ राहुमूर्तये नमः ॥

ॐ सर्वाभीष्टफलप्रदाय नमः ॥

ॐ दीर्घाय नमः ॥

ॐ कृष्णाय नमः ॥

ॐ अतनवे नमः ॥

ॐ विष्णुनेत्रारये नमः ॥

ॐ देवाय नमः ॥

ॐ दानवाय नमः ॥

॥ इति राहु अष्टोत्तरशतनामावलिः सम्पूर्णम् ॥

 

बुधवार, 4 नवंबर 2020

 साधारणतया 'किन्नर' शब्द से बृहन्नला माना जाता है। यह बृहन्नला नहीं है। ये देवताओं के लोक में गाने-बजाने तथा मनोरंजन करने वाले देवताओं की शक्तियों से संपन्न होते हैं। किन्नरी यानी देवियां। हिमाचल में एक स्थान है किन्नौर, जो इन्हीं के नाम से जाना जाता है। मुख्य रूप से यह 8 होती हैं। यह शीघ्र प्रसन्न होने वाली देवियां हैं जिनकी साधना से द्रव्य, भोग, दिव्य रसायन, स्वर्ण, वस्त्रालंकार मिलते हैं एवं समस्त मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं। अप्सराओं की तरह इनकी भी साधना की जाती है, जो निम्नलिखित है-


(1) मंजूघोष किन्नरी- एक मास तक अमावस्या से पूर्णिमा तक साधना की जाती है तथा नित्य पूजन, नेवैद्य बली आदि कर्म किए जाते हैं। दिव्य रसायन व ऐश्वर्य देती हैं।> >
मंत्र- 'ॐ मंजूघोष आगच्छागच्छ स्वाहा।'
(2) मनोहारी किन्नरी- उपरोक्त वर्णित तरीके से साधना पर्वत शिखर पर की जाती है तथा सभी मनोकामनाएं भार्या के रूप में प्रदान करती हैं।
मंत्र- 'ॐ मनोहार्ये स्वाहा।'
3) सुभगा किन्नरी- उज्जट पर्वत शिखर पर साधन होता है तथा चंदन मिले जल से अर्घ्य देना पड़ता है। स्वर्ण मुद्राएं नित्य प्रदान करती हैं।
मंत्र- 'ॐ सुभगे स्वाहा।'

(4) विशाल नेत्रा किन्नरी- नदी के एकांत तट पर साधना की जाती है तथा भार्या बनकर नित्य स्वर्ण मुद्राएं देती हैं।> >
मंत्र- 'ॐ विशाल नेत्रे स्वाहा।'
(5) सुरति प्रिय किन्नरी- पवित्र नदी के संगम पर साधन होता है तथा वस्त्रालंकार तथा स्वर्ण प्रदान करती हैं।

मंत्र- 'ॐ सुरति प्रिये स्वाहा।'
(6) अश्वमुखि किन्नरी- निर्जन-उज्जट पर्वत‍ शिखर पर साधना से प्रसन्न होने वाली हैं तथा काम, भोग, ऐश्वर्य, धन व स्वर्ण प्रदान करती हैं।
मंत्र- 'ॐ अश्वमुखि स्वाहा।'
(7) दिवाकरी मुखि किन्नरी- निर्जन पर्वत शिखर पर साधना की जाती है तथा भोग व ऐश्वर्य प्रदान करती हैं।> >
मंत्र- 'ॐ दिवाकरी मुखि स्वाहा।'
(8) मंगला किन्नरी- नितांत एकांत में नदी के संगम या तट पर साधना की जाती है तथा अपनी इच्छा बताने पर पूरी करती हैं।        
ॐ मंगला किन्नरी स्वाहा
मनुष्य अपना प्रयास अभीष्ट पूर्ति के लिए करता है। भाग्यवश उसे सफलता प्राप्त होती है, लेकिन तंत्र के माध्यम से देवकृपा प्राप्त कर वह अपनी इच्छा पूर्ण कर सकता है। आवश्यकता है केवल इच्छाशक्ति की तथा एक योग्य मार्गदर्शक की।
सभी साधनाओ की विधि अलग अलग हे पूरी बिधी जानकारी के बिना साधना चालू न करे 

साधना के नियम

साधना के नियम 
साधना के करने के पहले ये जानना जरूरी होता हे की आप साधना किस देवी देवता की कर रहे हो उसके आपकी ज़िंदगी के क्या क्या असर होगा साधना की केटीगिरी क्या हे फिर साधना मे उपयोग होने वाले समान क्या क्या हे क्या आपने अपने गुरु की आज्ञा ली हे क्यूकी आजकल YouTube एवं गूगल से देख देख कर साधना चालू कर देते हे फिर फस जाते हे तो यहा वाहा भटकते रहते हे इसलिए साधना चालू करने के पहले गुरु की आज्ञा लेना जरूरी होता हे साधना चालू करने के बाद जो भी शक्ति आपके पास आती हे तो उससे डरना नहीं होता हे वो आपकी आख का धोका होता हे अब साधना के नियम की जानकारी देता हे 
1 बर्म्ह्चरी सबसे जरूरी होता 
2 शरीर की शुद्धता एवं जिस जगह आप साधना करना चाहते हे उस जगह की शुद्धता 
3 साधना के समय हो सके आप जहा साधना करना चाहते हे वह कोई आता जाता न हो तो बहुत अच्छा होगा 
4 यदि साधना शमशान मे करते हे तो स्थान बंधन आनिवार्य हे 
5 साधना चालू करने के पहले संकल्प करना जरूरी होता हे संकल्प मे जिस मनोरथ सिद्ध करने के लिए आप साधना कर रहे हे उसका उल्लेख करना आनिवार्य होता हे 
6 देखने मे आया हे की लोग क्लास 1 मे पास किए बिना की कॉलेज मे प्रवेश लेना चाहते हे इसलिए क्रम आनुसार ही साधना चालू करे 

शेष आगे हे